न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन: |
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै: || 40||
न–नहीं; तत्-वह; अस्थि है; पृथिव्याम्-पृथ्वी पर; वा-या; दिवि-स्वर्ग के उच्च लोक; देवेषु–स्वर्ग के देवताओं में; वा-याः पुनः-फिर; सत्त्वम्–अस्तित्त्व; प्रकृति-जै-प्रकृति से उत्पन्न; मुक्तम-मुक्त होना; यत्-जो; एभिः इनके प्रभाव से; स्यात्–है; त्रिभिः-तीन; गुणैः-प्रकृति के गुण।
BG 18.40: पृथ्वी और स्वर्ग के उच्च लोकों में रहने वाला कोई भी जीव प्रकृति के इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त नहीं होता।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन: |
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै: || 40||
पृथ्वी और स्वर्ग के उच्च लोकों में रहने वाला कोई भी जीव प्रकृति के इन तीन गुणों के प्रभाव से …
Sign in to save your favorite verses.
Sign In
Navigate directly to the wisdom you seek
Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!
श्वेताश्वतरोपनिषद् में माया शक्ति का विस्तृत वर्णन करते हुए माया शक्ति को त्रिरंगी कहा गया है
अजामेकां लोहिताशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः।
अजो टेको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः
(श्वेताश्वतरोपनिषद् -405)
"माया शक्ति के तीन रंग हैं-श्वेत, लाल और काला अर्थात् यह सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सहित त्रिगुणी है। यह असंख्य जीवों के लिए माँ के गर्भ के समान है। यह भगवान जो पूर्ण सर्वज्ञ हैं, द्वारा अस्तित्त्व में लायी जाती है और उनका संयोग प्राप्त करती है। भगवान इस भौतिक शक्ति माया से कोई संबंध नहीं रखता। वह स्वतंत्र रूप से अपनी दिव्य लीलाओं में आनन्द लेता है किन्तु जीव माया का भोग करते हैं और बंधनों में पड़ जाते हैं।" माया का प्रभुत्व नरक के निम्न लोकों से स्वर्ग के ब्रह्मलोक तक होता है। चूँकि प्रकृति के तीन गुण-सत्त्व, रजस् और तमस् मायाशक्ति के अंतर्निहित हैं अतः ये सभी भौतिक लोकों में पाये जाते हैं। इसलिए इन लोकों के प्राणी चाहे वे पृथ्वी लोक के मनुष्य हों या स्वर्गलोक के देवता ही क्यों न हों, सभी तीन गुणों के अधीन रहते हैं। अंतर केवल इन गुणों के तुलनात्मक अनुपात में है। नरक लोकों के निवासियों में तमोगुण की प्रबलता होती है, पृथ्वीलोक पर निवास करने वाले में रजोगुण की प्रधानता होती है और स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं में सत्त्वगुण की प्रबलता होती है। अब इन तीन तत्त्वों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करेंगे कि मानव जाति में क्यों भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रकृति देखने को मिलती है।